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कड़कनाथ मुर्गी पालन

kadaknath murgi palan in hindi: आपने ‘कड़क चाय’ के बारे में तो ज़रूर सुना होगा? लेकिन, क्या आपने ‘कड़कनाथ’ मुर्गे के बारे में सुना है?... नहीं, तो आज यहां हम आपको कड़कनाथ मुर्गी पालन (kadaknath murgi palan) के बारे में जानकारी देंगे। 


यहां हम आपको कड़कनाथ मुर्गी पालन कैसे करें (kadaknath murgi palan kaise kare)? बाजार में कड़कनाथ मुर्गी के अंडे का रेट क्या है? सभी के बारे में बताएंगे। आपको यहां कड़कनाथ मुर्गी पालन (kadaknath murgi palan in hindi) की पूरी जानकारी मिलेगी। 


कड़कनाथ मुर्गी पालन किसानों के लिए मुनाफे का सौदा है। स्वाद और औषधीय गुणों के चलते इस मुर्गे की मांग हर जगह है। इन दिनों कड़कनाथ (kadaknath) फायदे का कारोबार कहा जा रहा है। इसकी कई वजह हैं, एक तो ये महंगा बिकता है। इसके रखरखाव में लागत कम है, दूसरा ये खाने वाले को कई बीमारियों में फायदा पहुंचाता है। 


तो आइए, द रूरल इंडिया के इस ब्लॉग में सबसे पहले कड़कनाथ मुर्गे के बारे में जानते हैं। 


कड़कनाथ मुर्गे की विशेषताएं (Features of Kadaknath Chicken)

कड़कनाथ मुर्गा देखने में काला होता है। इसके मांस और खून भी काले रंग का होता है। इसके अंडे सुनहरे रंग का होता है। इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन अधिक होती है। इसमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी काफी कम होता है। वसा की मात्रा कम होने से हृदय और डायबिटीज रोगियों के लिए इसका चिकन बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। 


कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति (Origin of Kadaknath Chicken)

कड़कनाथ मुर्गे (karaknath murgi) की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले की कठ्ठिवाड़ा और अलीराजपुर के जंगलों में हुई है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश के कड़कनाथ मुर्गे को जीआई टैग मिला हुआ है। आपको बता दें, जीआई टैग एक तरह की विशेष पहचान होती है। इसका निर्धारण भौगोलिक उत्पत्ति और विशेष गुणों के आधार पर किया जाता है। यह टैग दर्शाता है कि इसके जैसा कोई और नहीं है। 


कड़कनाथ मुर्गी पालन कैसे करें


कड़कनाथ मुर्गी पालन कैसे करें (kadaknath murgi palan kaise kare)

कड़कनाथ मुर्गी का पालन भी आप देसी मुर्गी पालन की तरह कर सकते हैं। इस मुर्गे के खान-पान में कोई ज्यादा खर्च नहीं आता है। ये हरे चारे, बरसीम, बाजरा चरी खाकर भी तेजी से बढ़ते हैं। 


चूजों के लिए आप किसी प्रगतिशील किसान या जिले में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं। इसकी शुरुआत आप कम से कम 30 चूजो से कर सकते हैं। बजट थोड़ा ज्यादा हो तो आप और ज्यादा चूजे खरीद सकते हैं। 


कड़कनाथ मुर्गी पालन (kadaknath murgi palan) आप दो तरह से पालन कर सकते हैं। 


  1. खुले पोल्ट्री फार्म बनाकर

  2. बंद पोल्ट्री फार्म बनाकर 



कड़कनाथ मुर्गी पालन के लिए इन बातों का रखें ध्यान (Keep these things in mind for Kadaknath poultry farming) 

  • कड़कनाथ मुर्गी पालन (kadaknath murgi palan) के लिए पोल्ट्री फार्म गांव या शहर से थोड़ी दूरी पर ही खोलें।

  • इसके लिए आप कृषि विज्ञान केंद्र या किसी पोल्ट्री फार्म से ट्रेनिंग ले लें। 

  • स्वस्थ चूजों को ही पोल्ट्री फार्म में रखें।

  • फार्म को थोड़ी ऊंचाई पर बनाएं, ताकि पानी का जमाव न हो।

  • फार्म में रोशनी और पानी की पर्याप्त व्यवस्था रखें। 



कड़कनाथ मुर्गी पालन के लिए मिलती है सरकारी मदद (kadaknath murgi palan yojana) 

यदि आपकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो आप इसके लिए ‘कड़कनाथ मुर्गी पालन योजना’ (kadaknath murgi palan scheme) का मदद ले सकते हैं। आपको बता दें, मध्य प्रदेश सरकार कड़कनाथ नस्ल के मुर्गा संरक्षण और संवर्धन के लिए यह योजना चला रही है। राज्य सरकार कड़कनाथ के 40 चूजों के पालन के लिए 4400 रूपए का अनुदान देती है। इसका लाभ लेने के लिए आप संबंधित जिले के पशु चिकित्सा अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें। 


इसके अलावा सभी राज्यों में नेशनल लाईव स्टॉक मिशन और नाबार्ड के पोल्ट्री वेंचर कैपिटल फंड (PVCF) के तहत आप लोन और सब्सिडी का लाभ ले सकते हैं।  इसमें सामान्य वर्ग को 25 प्रतिशत तक की सब्सिडी मिलती है। बीपीएल और SC/ST और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के लिए करीब 33 प्रतिशत तक की सब्सिडी का प्रावधान है। 


कड़कनाथ मुर्गी (kadaknath murgi palan) पालन में लागत और कमाई

इसका रखरखाव बॉयलर और देसी मुर्गी के मुकाबले आसान होता है। इस मुर्गे के खान-पान में कोई ज्यादा खर्च नहीं आता है। अगर इनको बाग में शेड बनाकर पाला जाए तो बहुत इन पर कोई खर्च नहीं है।


कमाई की बात करें तो कड़कनाथ (karaknath murgi) से आप कम लागत में देसी मुर्गी से कई गुना कमा कर सकते हैं। बाजार में कड़कनाथ मुर्गी के चूजे का रेट 70-80 रुपए तक है। वहीं अंडों की बात करें तो बाजार में कड़कनाथ मुर्गी के अंडे का रेट 20-30 रुपए है। यदि आप केवल 100 चूजो से इसकी शुरुआत करते हैं, तो आपको इससे लगभग 60-70 हजार रुपए कमा सकते हैं। आप अंडे और चिकन के अलावा इसके चूजे को बेचकर भी कमाई कर सकते हैं। यह जल्दी बिकने वाली नस्ल है। बाजार में इसकी कीमत प्रति किलोग्राम 700-1000 रुपए तक है।



कड़कनाथ मुर्गी पालन के फायदे (Benefits of Kadaknath Poultry Farming)

  • कड़कनाथ मुर्गों की बाजार में ज्यादा डिमांड

  • अन्य मुर्गियों के तुलना में अधिक प्रतिरोधक क्षमता

  • अधिक औषधीय गुण

  • रखरखाव बेहद आसान

  • खानपान में ज्यादा खर्च नहीं

  • इसका मीट कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद



यह जानकारी कैसे लगी आप हमें कमेंट कर जरूर बताएं। इसके साथ इस लेख को दूसरे लोगों तक शेयर भी करें।


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Singhara ki kheti : सिंघाड़ा की खेती

सिंघाड़ा की खेती कैसे करें (Singhara ki kheti): आजकल खेती में लोगों की दिलचस्पी फिर से बढ़ रही है। लोग इस तरह की खेती करने पर जोर दे रहे हैं जिनमें उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिल सके, ऐसी ही एक फसल है, सिंघाड़ा (water chestnut) 


जी हां! ठंड के समय में सड़क किनारे सिंघाड़ा तो लगभग सभी ने खाया होगा। सिंघाड़ा (singhada) में कई पौषक तत्व मौजूद होते हैं। इसे बने आटा का उपयोग व्रत-त्योहारों में खूब किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिंघाड़े की खेती कैसे होती है और ये आपके लिए कितनी फायदेमंद हो सकती है?


मौजूदा दौर में सिंघाड़ा की खेती (singhara ki kheti) अच्छी आय का एक प्रमुख साधन है, इसीलिए इसे नकदी फसल कहा जाता है। किसान सिंघाड़े की खेती वैज्ञानिक तरीके से करें, तो इससे वे अधिक उत्पादन और मुनाफा ले सकते हैं। 


तो आइए, द रूरल इंडिया के इस लेख में सिंघाड़ा की खेती (singhara ki kheti) को विस्तार से जानें।  


इस लेख में आप जानेंगे

  • सिंघाड़ा के लिए ज़रूरी जलवायु

  • खेती के लिए उपयोगी मिट्टी

  • सिंघाड़ा की खेती का सही समय

  • खेती की तैयारी कैसे करें

  • सिंघाड़ा की उन्नत किस्में

  • सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

  • रोग एवं कीट प्रबंधन कैसे करें।

  • सिंघाड़ा की खेती में लागत और कमाई

 

Singhara ki kheti : सिंघाड़ा की खेती


सिंघाड़ा एक नकदी फसल है। यह एक जलीय पौधा है जिसकी जड़ पानी के अंदर रहती है। इसका इस्तेमाल सब्जी, फल या सूप किसी भी  तरह से किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के रोगों में यह औषधि का काम करता है।


सिंघाड़ा के लिए ज़रूरी जलवायु 

सिंघाड़ा (water chestnut) उष्णकटिबन्धीय जलवायु की फसल है। इसकी खेती उतर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में खूब होती है।

 

इसकी खेती के लिए बेहद ज़रूरी है कि 1 से 2 फीट तक पानी का भराव रहे क्योंकि ये खेती स्थिर जल वाले इलाके में ही की जा सकती है।


खेती के लिए उपयोगी मिट्टी

जलीय पौधा होने के कारण  मिट्टी इसकी खेती के लिए इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रखती है, लेकिन यह पाया गया है कि जब जलाशयों की मिट्टी सामान्य से ज्यादा, भुरभुरी होती है तो सिंघाड़ा बेहतर उपज देता है।


इन सब के साथ ही खेतों में ह्युमस की मात्रा अच्छी होनी चाहिए। सिंघाड़ा उत्पादन हेतु दोमट या बलुई दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 तक होता है अधिक उपयुक्त होती है।


सिंघाड़े की बुआई का सही समय

इस फसल के लिए पानी की ज़रूरत रहती है इसलिए मानसून के समय इसके लिए एकदम बेहतर समय माना जाता है। मॉनसून की बारिश के साथ ही सिघाड़े की बुआई शुरू हो जाती है। जून-जुलाई में सिंघाड़ा बोया जाता है। आमतौर पर छोटे तालाबों, पोखरों में सिंघाड़े का बीच बोया जाता है लेकिन मिट्टी के खेतों में गड्ढे बनाकर उसमें पानी भरके भी पौधों की रोपाई की जाती है। जून से दिसंबर यानी 6 महीने की सिंघाड़े की फसल से बढ़िया मुनाफा कमाया जा सकता है।


सिंघाड़े के लिए खेती की तैयारी

इस फसल के लिए नर्सरी तैयार करते समय ध्यान रखें कि आप जनवरी-फरवरी के महीने में नर्सरी तैयार करें। अगर आप बीज से पौध तैयार कर रहे हैं तो जनवरी फरवरी के महीने में बीज को बो दें और जब पौध रोपण के लायक हो जाए तो मई जून के महीने में इनमें से एक एक मीटर लंबी बेल तोड़ कर उन्हें तालाब में रोप देना चाहिए। 


अगर आप इस बात को लेकर परेशान है कि बीज कहां से लें तो इसके लिए आप उद्यान विभाग या अपने राज्य के बीज निगम से संपर्क कर सकते हैं। लेकिन अगर आप पहले से ही सिघाड़ा की खेती (singhara ki kheti) कर रहे हैं तो अगली फसल के लिए दूसरी तुड़ाई के स्वस्थ पके फलों का इस्तेमाल बीज के रूप में कर सकते है।


यहां आपको यह ध्यान देना होगा कि आपको इन्हें जनवरी तक पानी में भिगोकर ही रखना होगा और अंकुरण से पहले यानि कि फरवरी के पहले सप्ताह तक इन्हें टैंक या तालाब में डाल दें। मार्च में जब फलों से बेल निकलने लगे तो जून या जुलाई के महीने में आप रोपण कर सकते हैं।


सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

इस फसल में आपको बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। लेकिन खाद की ज़रूरत कम पड़ती है। इसके लिए आपको निम्न तरह की खाद की ज़रूरत पड़ती है। पौध रोपण से पहले प्रति हेक्टेयर के हिसाब से  8 से 10 टन गोबर की खाद डालें। प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 40 किलो नाइट्रोजन और 60 किलो फोस्फोरस इस्तेमाल करें। प्रति हेक्टेयर के हिसाब  से 40 किलो पोटास डालें। इन तीनों की एक तिहाई मात्रा रोपने से पहले इस्तेमाल करें और बची हुई नाइट्रोजन को एक एक महीने के अंतराल पर डालें।


सिंघाड़ा की उन्नत किस्में

 सिंघाड़े की दो तरह की किस्में देखने को मिलती है

लाल छिलके वाली 

इस किस्म की सबसे उन्नत जाति VRWC1 और VRWC 2 है। लाल छिलके वाली किस्म को बहुत कम उगाया जाता है क्योंकि ये कुछ दिन में ही काली पड़ने लगती हैं और बाज़ार में उनका दाम अच्छा नहीं मिल पाता है।

हरे छिलके वाली

व्यापारिक तौर पर यह किस्म काफी प्रचलित है। इसकी सबसे उन्नत जाती है VRWC 3। यह लंबे समय तक ताज़ी रहती है और बाज़ार में काफी बिकती है।


मौजूदा किस्मों में जल्द पकने वाली जातियां हरीरा गठुआ, लाल गठुआ, कटीला, लाल चिकनी गुलरी, है और इनकी तुड़ाई 120 से 130 दिन में होती है। वहीं देर से पकने वाली किस्में- करिया हरीरा, गुलरा हरीरा, गपाचा में पहली तुड़ाई 150 से 160 दिनों में होती है।


इसके अलावा एक और चीज जो ध्यान में रखनी ज़रूरी है वो ये कि कांटे वाली सिंघाड़ा किस्मों की जगह बिना कांटे वाली सिंघाड़ा किस्मों का इस्तेमाल करें क्योंकि ये किस्में ज्यादा उत्पादन देती है और इनकी गोटियों का आकार भी बाकी किस्मों के मुकाबले बड़ा होता है जिसके कारण तुड़ाई आसान हो जाती है।


सिंघाड़ा की खेती (water chestnut farming) में रोग एवं कीट प्रबंधन

सिंघाड़े की खेती में ज्यादातर सिंघाड़ा भृंग, नीला भृंग, माहू, घुन और लाल खजूरा नाम के कीट का खतरा होता है, जो फसल को 25%-40% तक कम कर देते है।

इसके अलावा लोहिया और दहिया रोग का खतरा होता है। इससे बचाव के लिए हमें समय रहते कीटनाशक का इस्तेमाल कर लेना चाहिए।


सिंघाड़ा की खेती (singhara ki kheti) में लागत और कमाई

सरल शब्दों में समझें तो लागत और कमाई को इस तरह से समझ सकते हैं.

  • हरे फल – 80 से 100 क्विंटल/ हेक्टेयर।
  • सूखी गोटी – 18 से 20 क्विंटल/ हेक्टेयर।
  • कुल लागत – लगभग 50000 रू/ हेक्टेयर।


इस तरह से हम देखते हैं कि कुल आमदनी में से लागत निकल कर प्रति हेक्टर 1 लाख का शुद्ध लाभ हो जाता है। हरे सिंघाड़े को आप तुरंत की बाज़ार में बेच सकते हैं, साथ ही आप चाहें तो इसे सुखाकर भी बेच सकते हैं।


सिंघाड़ा खाने के फायदे (benefits of water chestnut)

  • अस्थमा के मरीजों के लिए सिंघाड़ा बहुत फायदेमंद होता है।

  • सिंघाड़ा बवासीर जैसी मुश्किल समस्याओं से भी निजात दिलाने में कारगर है।

  • सिंघाड़ा खाने से फटी एड़ि‍यां भी ठीक हो जाती हैं। इसके अलावा शरीर में किसी भी स्थान पर दर्द या सूजन होने पर इसका लेप बनाकर लगाने से बहुत फायदा होता है।

  • इसमें कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसे खाने से हड्ड‍ियां और दांत दोनों ही मजबूत रहते हैं। साथ ही यह आंखों के लिए भी फायदेमंद है।

  • प्रेग्नेंसी में सिंघाड़ा खाने से मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं। इससे गर्भपात का खतरा भी कम होता है। इसके अलावा सिंघाड़ा खाने से पीरियड्स की की समस्याएं भी ठीक हो जाती है। 


ये तो थी, सिघाड़ा की खेती (water chestnut farming in hindi) से जुड़ी सभी जानकारी। लेकिन, The Rural India पर आपको मशीनीकरण, सरकारी योजना और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।


अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो, तो इसे मित्रों तक जरूर पहुंचाए। जिससे दूसरे किसान मित्र भी सिघाड़ा की खेती (singhara ki kheti in hindi) की जानकारी प्राप्त कर सकें।


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बटेर पालन कैसे करें, यहां जानें

bater palan kaise kare (bater palan in hindi): हमारे देश में मुर्गी और बत्तख पालन के बाद बटेर पालन का तीसरा स्थान है। इस व्यवसाय में मुर्गी और बत्तख की अपेक्षा कम झंझट और कम लागत वाला व्यवसाय है। इनदिनों बटेर पालन (Bater palan) एक आकर्षक और लाभकारी कृषि व्यवसाय के रूप में उभरा है।


हमारे देश में बटेर का जिक्र प्राचीन इतिहास में भी मिलता है। इसके मांस औषधीय गुणों से भरपूर और बहुत स्वादिष्ट होते हैं। आपको बता दें, यह जंगली पक्षी है। बाज़ार में मांग ज़्यादा होने के कारण बटेर का बड़े पैमाने पर अवैध रूप से शिकार होता रहा है। अवैध शिकार की वजह से ही इसकी जनसंख्या में भाड़ी कमी आई है। 


सरकार ने बटेर की लुप्त होती संख्या को देखते हुए इसके संरक्षण हेतु बटेर का शिकार वन्य जीवन संरक्षण कानून, 1972 के तहत प्रतिबंधित कर दिया था.लेकिन यह प्रतिबंध 2014 से हटा ली गई है। 


बटेर की जापानी नस्ल पालने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। जिससे किसान अब मुर्गी पालन के बदले बटेर पालन (Bater palan) में भी किस्मत आजमाने लगे हैं। 


तो आइए, द रूरल इंडिया के इस ब्लॉग में बटेर पालन व्यवसाय (bater palan in hindi) को करीब से जानें।


बटेर पालन के लिए जलवायु

भारत की जलवायु बटेर पालन (Bater palan) के लिए काफी अनुकूल है। हमारे देश में सबसे अधिक बटेर का पालन बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश में किया जाता है। बटेर के लिए अधिक गर्म जलवायु की जरूरत नहीं होती है। 10 सेंटीग्रेट से 30 सेंटीग्रेट की तापमान इसके लिए काफी उपयुक्त होती है। क्योंकि कड़ी ठंड या बहुत ज्यादा गर्मी में इसके चूजे मर जाते हैं। 


बटेर के लिए आवास प्रबंधन

  • बटेर को देशी मुर्गी की तरह पाला जा सकता है। 

  • इसके लिए आप खुली शेड बना सकते हैं। 

  • 10X10 फीट में लगभग 50-100 चूजे आसानी से रह सकते हैं। 

  • इसे ग्रामीण परिवेश में आसानी से पाला जा सकता है। 

  • आवास को हमेशा साफ रखें। शेड में अच्छी तरह से हवा और रोशनी आनी चाहिए। 

  • बटेर के आवास के पास हरे पौधे या पेड़ हो तो बहुत ही बेहतर रहता है। 


बटेर के लिए भोजन प्रबंधन

एक किलो बटेर का उत्पादन करने के लिए 2 से 2.5 किलो आहार की जरूरत होती है। बटेर के लिए आप मुर्गियों को देने वाले फीड भी दे सकते हैं। अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला संतुलित आहार खिलाना बहुत जरूरी है। एक व्ययस्क बटेर को प्रतिदिन 20-35 ग्राम आहार की आवश्यकता होती है। एक नवजात शिशु बटेर के राशन में लगभग 27% प्रोटीन और व्ययस्क के लिए 22-24 % प्रोटीन जरूर दें। बटेर को सदैव ताजे पानी ही पिलाएं। 


Bater palan :  बटेर पालन

बटेर की नस्लें

पूरी दुनिया में बटेर की लगभग 18 नस्लें उपलब्ध है। जिसमें जापानी बटेर को हमारे देश में सबसे अधिक पाला जाता है। जिसे 70 के दशक में अमेरिका से भारत में लाया गया था। 


  • मांस उत्पादन की दृष्टि से बोल व्हाइट अच्छा माना जाता है।  यह अमरीकी नस्ल की बटेर है। 

  • दूसरी नस्ल व्हाइट बेस्टेड है जो भारतीय प्रजाति का ब्रायलर बटेर है।यह नस्ल भी मांस उत्पादन के लिए उपयुक्त है।

  • अधिक अंडे देने वाली नस्लों में ब्रिटिश रेंज, इंग्लिश व्हाइट, मंचूरियन गोलन फिरौन और टक्सेडो है।

  • किसान अपने उत्पादन उद्देश्य के अनुसार किसी भी नस्ल का चयन कर सकते हैं।


यहां से लें बटेर पालन का प्रशिक्षण

भारत में पक्षियों के अनुसंधान के लिए बरेली के इज्जतनगर में केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान बनाया गया है। यहां बटेर पालन के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है। यहां से आप बटेर पालन का प्रशिक्षण और पूरी जानकारी ले सकते हैं। 

संस्थान का संपर्क सूत्र है- 0581-2300204, 0581-2301220, 18001805141


बटेर पालन के लाभ

  • बटेर पालन में मुर्गी पालन से लागत कम आती है।

  • 45 से 50 दिनों में ही बाज़ार में बिकने के लिए तैयार हो जाता है।

  • बटेर अंडे भी जल्द देती है. चूज़े 45 दिनों में अंडे देने लगते हैं।

  • एक साल में यह बटेर 280 से 290 अंडे देती है।

  • इन्हें रहने के लिए बहुत कम जगह की आवश्यकता होती है।

  • बटेर पक्षी का मांस और अंडे बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं।

  • बेरोज़गारों  के लिए बटेर पालन रोज़गार का अच्छा विकल्प हो सकता है।


बटेर पालन में लागत और कमाई

  • एक चूजे की कीमत 6 रुपए होती है। 40-45 दिन पालने के बाद  इसकी वजन 200-300 ग्राम हो जाती है। जिसका बाजार में 40-50 रूपए मिल जाती है। 

  • यदि आप बटेर पालन को उन्नत विधि से करें तो इस बिजनेस से आप बेहतर लाभ कमा सकते हैं। 

  • यदि आप 100 बटेर से इसकी शुरूआत करते हैं। तो प्रति 3 माह में 10 हजार से 12 हजार रुपए और साल में 40-50 हजार रुपए शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। 


बटेर की मार्केटिंग कहां करें

किसानों का सबसे बड़ा प्रश्न रहता है कि बटेर को कहां बेचें। तो आपको बता दें इसकी बाजार में बहुत डिमांड है। इसके लिए बड़े शहरों में अलग से मार्केट हैं। यदि आप गांवों में भी बेचें तो मांस और अंडे दोनों आसानी से बिक जाती है। जरूरत है उपभोक्ताओं को बटेर की मांस और अंडे की औषधीय गुण बताने की। बटेर पक्षी के मांस और अंडे की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है।



ये तो थी, बटेर पालन (bater palan in hindi) की बात। लेकिन, The Rural India पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, सरकारी योजना और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी शेयर सकते हैं।


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