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नींबू घास की खेती से लाखों का मुनाफा! यहां जानें, लेमन ग्रास की खेती का तरीका

lemon grass farming in hindi: इन दिनों लेमन ग्रास की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। लेमन ग्रास को नींबू घास, चायना ग्रास और मालाबार घास आदि कई नामों से जाना जाता है। इसकी पत्तियों से नींबू की तरह सुगंध आती है। कई औषधीय गुणों से भरपूर लेमन ग्रास की पत्तियों का उपयोग चाय बनाने में भी किया जाता है। आपको बता दें, लेमन ग्रास के पौधे से सिट्रल (citral) नामक तेल प्राप्त किया जाता है। इससे औषधियों के निर्माण के साथ इत्र, साबुन और कई तरह के सौंदर्य प्रसाधन तैयार किए जाते हैं। 

 

आपको बता दें, भारत सरकार एरोमा मिशन (aroma mission) के तहत नींबू घास की खेती (lemon grass farming) को बढ़ावा दे रही है। कम लागत के लिए आप इस मिशन का लाभ ले सकते हैं। पौधों की तेजी से वृद्धि होने के कारण एवं अधिक मूल्य पर बिक्री होने के कारण लेमन ग्रास की खेती (lemon grass farming) किसानों के लिए बहुत लाभदायक है। नींबू घास की खास बात है कि इसे सूखाग्रस्त इलाकों में भी लगाया जा सकता है। 

 

तो आइए, द रुरल इंडिया के इस लेख में जानें- लेमन ग्रास (नींबू घास) की खेती कैसे करें?

 

लेमन ग्रास की खेती (nimbu ghas ki kheti) पर एक नज़र

  • लेमन ग्रास के पत्ते लंबे और हरे रंग के होते हैं।

  • हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 1000 मेट्रिक टन लेमन ग्रास का उत्पादन होता है।

  • एक एकड़ की खेती से लेमनग्रास के पौधे से तकरीबन 5 टन तक पत्तियां निकलती हैं।

  • लेमन ग्रास में विटामिन और मिनरल होने के कारण यह इम्यून सिस्टम को भी बढ़ाता है।

  • इसकी पत्तियों से नींबू जैसे सुगंध आती है इसलिए इसका नाम लेमन ग्रास (नींबू घास) रखा गया है।

  • एक बार पौधा लगाने के बाद किसान को लगभग 5-6 साल तक इससे उत्पादन ले सकते हैं। 

 

लेमन ग्रास की उपयुक्त मिट्टी और जलवायु

लेमन ग्रास(नींबू घास) की खेती लगभग सभी तरह की उपजाऊ मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परन्तु पौधों के विकास के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है। जल भराव वाली भूमि में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती कर के बेहतर पैदावार प्राप्त किया जा सकता है।

नींबू घास की खेती (nimbu ghas ki kheti) के लिए उष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। पौधों को धूप की आवश्यकता अधिक होती है। इससे पौधों में तेल की मात्रा बढ़ती है। लेमन ग्रास के पौधे न्यूनतम 15 डिग्री सेंटीग्रेड एवं अधिकतम 40 डिग्री सेंटीग्रेड तक तापमान सहन कर सकते हैं।


नींबू घास की खेती का उन्नत तरीका

लेमन ग्रास की खेती (nimbu ghas ki kheti) के लिए फरवरी से जुलाई तक का समय उपयुक्त है। लेमन ग्रास की खेती बीज और कलम की रोपाई के द्वारा की जाती है। इसके अलावा स्लिप विधि से भी इसकी खेती की जाती है। इस विधि में पुराने पौधों की जड़ों की रोपाई कर के पौधे तैयार किए जाते हैं।


लेमन ग्रास की खेती का सही तरीका

नींबू घास की खेती (nimbu ghas ki kheti) बीज के साथ पौधों के कलम की रोपाई के द्वारा भी की जा सकती है। बीज के द्वारा खेती करने के लिए सबसे पहले नर्सरी तैयार करनी होती है। नर्सरी तैयार करने में 2 से 3 महीने का समय लगता है। नर्सरी में तैयार किए गए पौधों में कम से कम 10 पत्ते होने के बाद पौधों की रोपाई की जा सकती है। यदि पौधों के कलम से रोपाई करनी है तो कलम की रोपाई सीधा मुख्य खेत में कर सकते हैं।

 

खेत की तैयारी

  1. सबसे पहले एक बार गहरी जुताई करें। इससे खेत में पहले से मौजूद खरपतवार नष्ट हो जायेंगे।

  2. इसके बाद 2 से 3 बार हल्की जुताई करके मिट्टी को समतल एवं भुरभुरी बना लें।

  3. पौधों एवं कलम की रोपाई के लिए खेत में क्यारियां तैयार करें।

  4. सभी कार्यों के बीच 20 सेंटीमीटर की दूरी रखें।

 

सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण

  • लेमनग्रास के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।

  • नर्सरी में तैयार किए गए पौधे या कलम की रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करें।

  • वर्षा होने पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।

  • गर्मी के दिनों में 8 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें।

  • ठंड के मौसम में 12 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

  • खरपतवार पर नियंत्रण के लिए प्रतिवर्ष 2 से 3 बार निराई गुड़ाई करें।

 

फसल की कटाई

  • एक बार लेमन ग्रास (नींबू घास) की खेती करके करीब 5-7 वर्षों तक फसल प्राप्त किया जा सकता है।

  • पौधों की रोपाई के 90 दिनों बाद फसल पहली कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

  • प्रत्येक वर्ष 4 से 5 बार फसल की कटाई की जा सकती है।

  • पौधों की कटाई भूमि की सतह से 10 से 15 सेंटीमीटर की ऊंचाई से करें।


नींबू घास की प्रमुख किस्में

भारत में लेमन ग्रास (नींबू घास) की कई किस्मों की खेती की जाती हैं। जिनमें प्रगती, प्रामण, ओडी 19, ओडी 408, एसडी 68, आरआरएल 16, आरआरएल 39, सीकेपी 25, कृष्णा, कावेरी शामिल हैं।

 

ये तो थी, नींबू घास की खेती (nimbu ghas ki kheti) की बात। यदि आप इसी तरह कृषि, मशीनीकरण, सरकारी योजना, बिजनेस आइडिया और ग्रामीण विकास की जानकारी चाहते हैं तो इस वेबसाइट की अन्य लेख जरूर पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ने के लिए शेयर करें। 

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sagwan ki kheti: सागौन की खेती से किसान होंगे मालामाल

sagwan ki kheti: सागौन (teak) की लकड़ी बहुत ही मजबूत होती है। इसकी मांग बाजार में हमेशा बनी रहती है। इसका इस्तेमाल बहुमुल्य फर्नीचरों से लेकर प्लाईवुड और रेल के डिब्ले तक में होता है। सागौन (teak) की लकड़ी में दीमक नहीं खाती है, इसलिए इस लकड़ी से बनी कोई भी चीज कई सौ सालों तक टिकती है। परंपरागत खेती की तुलना सागवान की खेती (sagwan ki kheti) में बहुत ही कम श्रम की ज़रूरत होती है।


हमारे देश में सागौन की लकड़ी की कमी हमेशा बनी रहती है। इसलिए सागौन की खेती (sagwan ki kheti) कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।


तो आइए, आज इस ब्लॉग में सागौन की खेती (sagwan ki kheti) की पूरी जानकारी जानें। 


सागौन की खेती के फायदे (Benefits of teak cultivation)

  • सागवान का पेड़ 10 से 12 साल में काटने लायक हो जाता है. 

  • किसान चाहें तो इससे और समय तक लगाए रख सकते हैं। 

  • एक एकड़ खेत में 400 पौधे लगाए जा सकते हैं।

  • इन पेड़ों को लगाने और पालन-पोषण में 40 से 45 हजार तक की लागत आती है। 

  • 10 से 12 साल में एक पेड़ कम से कम 35 से 40 हजार रुपए में आसानी से बिक जाता है। 

  • इस हिसाब से किसान 10 से 12 साल के इंतजार के बाद प्रति एकड़ करीब 1.6 करोड़ की कमाई कर सकते हैं। 

  • इस तरह इसकी खेती करने वाले किसान कुछ ही सालों में लखपति और करोड़पति बन सकते हैं।


सागौन की खेती के लिए आवश्यक मिट्टी और जलवायु

इसकी खेती बर्फीले और रेगिस्तान को छोड़कर सभी जगह की जा सकती है। इसके लिए लिए बलुई या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। शुष्क क्षेत्र में गर्मियों के दिन में अतिरिक्त सिंचाई की ज़रूरत होती है। 6.5 से 8.5 पीएचमान वाली मिट्टी सागवान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त होती है।


सागवान के पेड़ का उपयोग (teak tree uses)

  • खिड़कियां और दरवाजे बनाने में 

  • फर्नीचर बनाने में

  • प्लाईवुड और फ्लोर बनाने में 

  • नाव, जलयान बनाने में 

  • रेल के डिब्बे बनाने में 


सागौन की खेती का समय (teak cultivation time)

सागौन की खेती करने से पहले किसानों को गर्मियों के दिनों में 4 फीट गहरे गढ्ढे की खुदाई कर देनी चाहिए। इसके बाद बरसात के मौसम में गोबर या कंपोस्ट खाद को डाल पौधे लगाने चाहिए। जून-जुलाई का महीना सागवान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त होता है। 


सागौन के पेड़ लगाने का तरीका (how to plant teak tree)

  • सबसे पहले खेत को 2 से 3 बार जुताई करके मिट्टी को भुरभरी बना लें। 

  • गढ्ढे में खाद, कीटनाशक आदि ज़रूर डालें। 

  • प्रति एकड़ खेत में 500 से 800 से अधिक पौधे नहीं लगाएं। 

  • पौध से पौध की दूरी 5 मीटर रखें।


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betel nut farming: सुपारी की खेती कितनी और कैसे है फायदेमंद, यहां जानें

सुपारी की खेती (betel nut farming in hindi): विश्व में सुपारी (Betel) उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है। आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में लगभग 925 हजार हेक्टेयर में सुपारी की खेती (supari ki kheti) होती है, जिसमें 50 प्रतिशत उत्पादन अकेले भारत में होता है। 

 

आपको बता दें, सुपारी (Betel) के पेड़ नारियल की तरह 50 से 60 फीट तक ऊंचे होते हैं, जो लगभग 5-6 सालों में फल देना शुरू कर देते हैं। सुपारी का इस्तेमाल पान, गुटखा मसाला के रूप में किया जाता है। इसके साथ ही हिंदू मान्यताओं के अनुसार सुपारी का इस्तेमाल धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। 

 

सुपारी (Betel) में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो कई बीमारियों की रोकथाम एवं इलाज में मददगार सिद्ध होते हैं। मांग अधिक होने के कारण एवं अपने गुणों के कारण सुपारी की खेती (supari ki kheti) किसानों के लिए काफी फायदेमंद है। 

 

तो आइए, द रुरल इंडिया के इस लेख में सुपारी की खेती (supari ki kheti in hindi) की संपूर्ण जानकारी जानें। 

 

सुपारी की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी

भारत में सुपारी की खेती समुद्र तटीय इलाकों में की जाती है। भारत में असम, पश्चिम बंगाल, केरल और कर्नाटक में खूब होती है। इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु काफी उपयुक्त होती है। इसके लिए 25 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान काफी अच्छा माना जाता है। 

 

सुपारी की खेती (supari ki kheti) कई प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन जैविक पदार्थों से भरपूर लाल मिट्टी, चिकनी दोमट मिट्टी सुपारी की खेती के लिए फायदेमंद होता है। मिट्टी का पी.एच. मान 7 से 8 के बीच होना चाहिए।

 

सुपारी की खेती के लिए उपयुक्त समय

  • गर्मियों में पौधों को मई से जुलाई के मध्य लगा देना चाहिए।

  • सर्दियों में बुवाई का उचित समय सितंबर से अक्टूबर का होता है।

 

खेत की तैयारी

  • खेत की सफाई कर खेत की अच्छी तरह से जुताई करें।

  • इसके बाद खेत में पानी लगाकर सूखने के लिए छोड़ दें।

  • पानी सूखने पर रोटावेटर के द्वारा खेत की अच्छी तरह जुताई करें।

  • पाटा लगा कर खेत को समतल करें।

  • पौधों की रोपाई के लिए 90 सेंटीमीटर लंबाई, 90 सेंटीमीटर चौड़ाई और 90 सेंटीमीटर गहराई के गड्ढे तैयार करें।

  • गड्ढों की आपस में दूरी 2.5 से 3 मीटर तक रखें।

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बांस की खेती (bans ki kheti)

bans ki kheti kaise karen: आज भारत में किसानों के पास कृषि क्षेत्र से पैसा कमाने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। इन विकल्पों में आधुनिक तकनीक का प्रयोग और उन्नत प्रजातियों की खेती शामिल है। कृषि में नई तकनीकों और उन्नत किस्मों के जरिए किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं। हालांकि, इन विकल्पों से खेती-किसानी में लागत तो आती है। लेकिन किसान पर खर्चों के बोझ को कम करने के लिए सरकार भी भरपूर आर्थिक मदद प्रदान कर रही है। आर्थिक मदद वाली उन्नत किस्मों की खेती में बांस की खेती (bans ki kheti) भी शामिल है।


बांस की खेती के जरिए किसान अच्छा मुनाफा ले सकते हैं। साथ ही, बांस (bamboo) का प्रसंस्करण उन्हें अतिरिक्त आमदनी कमाने में मदद मिलेगी। बांस की खेती (bans ki kheti) के लिए सरकार भी शुरुआती पौधरोपण समेत दूसरे कामों में लागत घटाने के लिए किसानों की सहायता करेगी। इस प्रकार बांस की खेती (bamboo farming) फायदे का सौदा बन सकेगी।


तो आइए द रुरल इंडिया के इस लेख विस्तार से जानते हैं बांस की खेती कैसे करें (bans ki kheti kaise karen)...

 

क्या है बांस की खासियत

धरती पर प्रकृति के अद्भुत उपहारों में से बांस (bamboo) एक है। धरती पर पौधे के रूप में बांस की सबसे ज्यादा खपत होती है। भारत में बांस की करीब 136 प्रजातियां पाई जाती है। जंगल में बांस सिर्फ प्रकृति की देखरेख में फलते-फूलते हैं। जंगलों में सही देखरेख और प्रबंधन न होने के कारण बांस की उपज बर्बाद होती रहती है। लेकिन आधुनिकता के दौर में बांस की खेती (bamboo farming) के बारे में जागरूकता फैलाई जा रही है। बांस की खेती (bans ki kheti) से ग्रामीणों और आदिवासियों के जीवन यापन में सुधार आया है। कई राज्यों में बांस (bamboo) के लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन उद्योगों में बांस का प्रसंस्करण करके मकान निर्माण, हस्तशिल्प, सुगंधित अगरबत्ती, टोकरियां, झूले, पंखे और दूसरी लाजवाब चीजों का निर्माण किया जाता है। बांस का प्रसंस्करण रोजगार और आय सृजन का जरिया बना है। इससे ग्रामीण विकास में खास मदद मिल रही है। 

बांस की खेती (bamboo farming)

बांस की खेती (bans ki kheti) में लागत और कमाई

बांस की खेती मोटी कमाई का जरिया बन सकती है। क्योंकि समय के साथ बांस की खपत बढ़ती जा रही है और किसान इसका प्रसंस्करण करके दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं। प्रति हेक्टेयर जमीन पर 1500 पौधे लगाने हैं तो जमीन में 3 गुणा 2.5 मीटर की दर से रोपाई करनी होगी। इतना ही नहीं, बांस को पौधों के बीच में खाली बचे स्थान पर दूसरी फसल लगा सकते हैं। बांस की खेती (bans ki kheti) से हर 4 साल में लगभग 3 से 3.5 लाख रुपए का मुनाफा कमा सकते हैं। वहीं, मेड़ों पर 4*4 मीटर की दर से दूसरी फसलों की खेती करने पर हर साल में करीब 30 हजार रुपए तक की कमाई हो जाएगी। अगर किसान खुद बांस की फसल लगाकर उसका प्रसंस्करण करे तो कमाई की दर 3-5 गुना तक बढ़ जाएगी।

 

बांस की खेती के लिए सरकारी अनुदान और सहायता

राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत अगर बांस की खेती (bans ki kheti) में ज्यादा खर्चा हो रहा है, तो केंद्र और राज्य सरकार किसानों को आर्थिक राहत प्रदान करेंगी। बांस की खेती के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि की बात करें तो इसमें 50 प्रतिशत खर्च किसानों द्वारा और 50 प्रतिशत लागत सरकार द्वारा वहन की जाएगी। 

उदाहरण के लिए –बांस की खेती के लिए 3 साल में औसतन 240 रुपए प्रति पौध का खर्च आता है। जिसमें सरकार द्वारा 120 रुपए प्रति पौध हेतु आर्थिक अनुदान दिया जाएगा। सरकार द्वारा दिए जाने वाले 50 प्रतिशत अनुदान में 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। इस प्रकार किसानों पर पड़ने वाले खर्चों का बोझ काफी हद तक कम होगा ही। साथ ही, देशभर में बांस की खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।

बांस की खेती (bamboo farming)

बांस की खेती की जरूरत क्यों है?

बांस की खेती (bans ki kheti)  करके किसान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। इसके जरिए गांवों में आय सृजन के साथ-साथ ग्रामीणों के पोषण सुधार में भी काफी मदद मिल रही है। 

आज के दौर में बांस (bamboo) के बने उत्पादों ने बाजार में अपने कदम जमा लिए हैं। बांस की खेती के जरिए लकड़ी के उत्पादों पर इंसान की आत्मनिर्भरता को कम करने में मदद मिल रही है। शुरुआत से ही इंसानों ने अपने दैनिक जीवन में लकड़ी के उत्पादों का उपयोग किया है। इसकी खपत बढ़ने पर तेजी से पेड़ों का कटाव हुआ और जंगल नष्ट होने लगे। खेती में आधुनिक तकनीक और उन्नत बदलावों के कदम रखते ही बांस के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी।

एक रिसर्च से पता चला कि पेड़ों से मिलने वाली लकड़ी के उत्पादन में 80 साल से भी अधिक समय खर्च होता है। लेकिन बांस (bamboo) की पहली उपज 3-4 साल में ही तैयार हो जाती है। इसकी कटाई के बाद करीब 40 साल तक फसल प्रबंधन के जरिए ही फायदा मिलता रहेगा। इसकी पत्तियां पशुओं को पोषण प्रदान करेंगी। किसान बांस की किस्म और सहूलियत के हिसाब से एक हेक्टेयर में करीब 1500 से 2500 पौधे लगाए जाते हैं। जहां, बांस की खेती (bans ki kheti) से जंगलों को दोबारा फलने-फूलने का मौका मिल रहा है। वहीं, इससे बने उत्पादों का प्रयोग करने से प्रकृति के संरक्षण में मददगार साबित हो रहा है।


बांस की खेती (bamboo farming) में ध्यान रखने योग्य बातें

किसानों के लिए बांस की खेती मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। लेकिन बांस की खेती में धैर्य रखना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि बांस की खेती रबी, खरीफ या जायद सीजन की खेती नहीं होती। इसको फलने-फूलने के लिए लगभग 3-4 साल का समय लग जाता है। हालांकि पहली फसल के कटते ही किसान की अच्छी आमदनी मिल जाती हैं। किसान चाहें तो बांस की खेती के साथ कोई दूसरी फसल भी लगा सकते हैं। बांस की खेती (bans ki kheti) के साथ दूसरी फसलों की एकीकृत खेती करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति भी बनी रहेगी। साथ ही, दूसरी फसलों से किसानों को समय पर अतिरिक्त आय भी मिल जाएगी।


डबल मुनाफा कमाने के लिए करें बांस की खेती

कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों में अब बांस का नाम भी शामिल हो चुका है। पहले तो बांस सिर्फ जंगलों में भी प्रकृति के स्पर्श से ही उग जाता था। लेकिन बांस के बढ़ते उपभोग के चलते इसकी व्यवसायिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि बांस की खेती में जद्दोजहद करने की आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ चार साल फसल का ठीक प्रकार पालन पोषण करें और करीब 40-45 तक बांस की फसल आपको मुनाफा देती रहेगी। इसके खेती के दौरान सबसे पहले नर्सरी तैयारी और पौध तैयार होने पर इसकी रोपाई का कार्य किया जाता है। इस बीच अगर किसान आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे है, तो सरकार द्वारा प्रस्तावित आर्थिक अनुदान भी ले सकते हैं। बांस की फसल में कीट-रोग लगने की संभावना भी कम ही रहती है। बस समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई करते रहें। इन्हीं कृषि कार्य़ो के साथ बांस की फसल भी बढ़ती रहेगी और आपका मुनाफा भी। 


राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission)

राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को बांस की खेती (bans ki kheti) को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें आर्थिक अनुदान दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार और आय सृजित करने के उद्देश्य से सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन का शुभारंभ किया। राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बांस की खेती (bamboo farming) और इसके प्रसंस्करण के लिए लघु और कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा देना है। इससे शहरों की तरफ पलायन रुकेगा और बांस (bamboo) उत्पादन के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बनेगा। इस योजना के तहत किसानों को सरकारी नर्सरी से बांस की फ्री पौध देने का प्रावधान है।

राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को बांस की नर्सरी लगाने के लिए 120 रुपए प्रति पौध की सहायता राशि भी दी जाएगी। जिससे किसान शुरुआत में बीज उत्पादन का कार्य कर सकें। राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत केंद्र और राज्य सरकार किसानों को आर्थिक राहत प्रदान करेंगी। सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि में 50 प्रतिशत खर्च किसान, जबकि अन्य 50 प्रतिशत लागत खुद सरकार द्वारा वहन करेगी। सरकार द्वारा प्रस्तावित 50 प्रतिशत अनुदान में 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार की तरफ से देय होगा। इससे किसान चिंतामुक्त होकर बांस की खेती कर सकेंगे।  


बांस की उन्नत किस्में (best bamboo for farming)

बांस की खेती (bamboo farming) करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि बांस की किस्मों का चुनाव किया जाए। 

भारत में बांस (bamboo) की कुल 136 किस्में पाई जाती है। जिसमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय प्रजातियां बम्बूसा ऑरनदिनेसी, बम्बूसा पॉलीमोरफा, किमोनोबेम्बूसा फलकेटा, डेंड्रोकैलेमस स्ट्रीक्स, डेंड्रोकैलेमस हैमिलटन, मेलोकाना बेक्किफेरा, ऑकलेन्ड्रा ट्रावनकोरिका, ऑक्सीटिनेनथेरा एबीसिनिका, फाइलोंस्तेकिस बेम्बूसांइडिस, थाइरसोस्टेकिस ऑलीवेरी आदि है। इनकी खेती भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा एवं पश्चिम बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, जम्मू कश्मीर, अंडमान निकोबार द्वीप समूह आदि राज्यों में की जा रही है।


बांस की खेती के लिए मिट्टी और जलवायु

बांस की खेती (bamboo farming) करने वाले इच्छुक किसान सर्वप्रथम मिट्टी की जांच करवाएं और अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें। बांस की उन किस्मों का चुनाव करें, जिनका बाजार आसानी से उपलब्ध हो, या जिनसे अधिक लाभ मिल सके। बांस की खेती (bans ki kheti) के लिए बलुई या दोमट मिट्टी सबसे अनुकूल रहती है। मिट्टी का पीएच तापमान भी 6.5 से 7.5 तक ही होना चाहिए। आमतौर पर बांस की नर्सरी मार्च के महीने में तैयार की जाती है। 

हालांकि कुछ राज्यों में मानसून के चलते जुलाई में भी बांस (bamboo) की रोपाई का काम किया जा सकता है। वर्तमान में पूर्वोत्‍तर भारत एवं मध्य भारत के किसानों इलाकों और जनजातीय क्षेत्रों की भूमि और जलवायु बांस की खेती के लिए अनुकूल साबित हो रही है।


बीजोपचार या बीज शोधन

बांस की बुवाई के लिए बीज प्राप्त करना बेहद जरूरी है। बांस का बीज इसके फूल खिलने के बाद प्राप्त होता है। हालांकि इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लगता है। लेकिन बांस की बुवाई करके अच्छी और गुणवत्तापूर्ण फसल प्राप्त की जा सकती है। बांस (bamboo) से पके हुए बीज प्राप्त करने के लिए बांस की फसल का झुंड़ बनाकर उन्हें एकत्रित करें और फसल की निचली जमीन से घास को साफ कर लें। इसके बाद बांस के झुंड से भूमि पर गिरने वाले बीजों को एकत्रित करके किसी सुरक्षित स्थान पर रखें।

जानकारी के लिए बता दें कि बीज पकने के दौरान फसल में चूहे और गिलहरियों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसलिए बांस की बीजों की सुरक्षा के लिए उन्हें किसी टिन के डब्बे में भरकर रखें। नर्सरी में बीजों को सीधे न बोएं, बल्कि बुवाई से पहले बीजों शोधन का काम पूरा करें। सबसे पहले बीजों को करीब 8 घंटे तक पानी में भिगोएं। इस प्रक्रिया में स्वस्थ बीज पानी के नीचे बैठ जाएंगे। सबसे पहले पानी में तैरते बीजों को निकालकर फेंक दें, इन्हें खेती के काम में न लें। अब पानी के निचली सतह से प्राप्त स्वस्थ बीजों का सुरक्षित रासायनिक दवाओं से बीज शोधन करें। इससे फसल में कीट और रोगों का प्रकोप नहीं होगा।


बांस की खेती के लिए नर्सरी की तैयारी

बांस की खेती (bans ki kheti) के लिए नर्सरी तैयार करना शुरुआती और महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है। पौधशाला तैयार करने के लिए सबसे पहले नर्सरी में 12X15 मीटर की क्यारी बनाएं और इनमें 30 सेमी तक गहरी खुदाई करें। सुविधानुसार छोटी क्यारियां बनाएं, जिससे सिंचाई करने में आसानी रहे। अब क्यारियों में गोबर की सड़ी हुई खाद फैला दें। अब उपचारित बांस के बीजों को नर्सरी में ठीक प्रकार से बोएं। बिजाई के बाद और नर्सरी में हल्की सिंचाई भी कर लें। जाहिर है कि बोए गए बीजों में अंकुरण के लिए मिट्टी में नमी का होना बेहद जरूरी है। जहां एक तरफ 10 दिन में बीजों का अंकुरण हो जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ खेत में रोपाई के लिए प्रकंद भी अंकुरण के 15-20 दिन बाद तैयार हो जाते हैं। ध्यान रखें कि प्रकंद थोड़ा मुड़ा हुआ और इसकी लंबाई करीब 15 से 20 सेमी होनी चाहिए। बांस के प्रकंद में कल्ले निकलने के बाद ही इसकी रोपाई खेतों में करें।

  • बांस के प्रकंदों में कल्लों के विकास के लिए उन्हें पॉलिथीन के थैलों में लगाएं।

  • पॉलीथिन के थैलों में तैयार बांस की उपज में हल्की सिंचाई का कार्य भी करें।

  • प्रकंदों में कल्ले निकलते समय चूहे और गिलहरियों के आक्रमण से पौधशाला की निगरानी करते रहें। 

  • बांस की रोपाई से पहले जमीन या खेत में जल निकासी की व्यवस्था भी कर लें, जिससे खेत में जल भराव न हो। 

  • अब भूमि पर खाद और उर्वरकों को फैला दें और कीटनाशक छिड़क दें। खेत में हल्की सिंचाई भी लगा दें। 

  • अब बांस की पौध को पॉलीथिन से निकालकर 5 X 5 मीटर की दूरी पर 0.3 X 0.3 X 0.3 मीटर के गड्ढों में रोपाई करें। 

  • रोपाई करने के बाद पौध में रोगों की निगरानी करें और समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई का कार्य भी करते रहें।


निराई-गुड़ाई और खरपतवार प्रबंधन

बांस की फसल (bans ki fasal) में रोपाई करने के बाद कीट और रोग प्रबंधन करना बेहद जरूरी है। इसलिए रोपाई के एक साल तक फसल की निगरानी करते रहें। इसके साथ-साथ रोपाई के बाद हर महीने फसल में निराई-गुड़ाई का काम करें। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहने से फसल में खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। वहीं रोपाई के दूसरे साल में पौधों के आस-पास दो मीटर का घेरा बनाएं और 15-30 सेमी० की गहरी गुड़ाई करें। हालांकि बांस की फसल में कीट और बीमारियों की संभावना नहीं होती। लेकिन कुछ प्रजातियों में अच्छे प्रबंधन की सख्त जरूरत होती है। क्य़ोंकि कभी-कभी काला धब्बा जैसे कवक रोग बांस के कल्लों को नुकसान पहुचा सकते है। इससे बांस की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।


बांस की खेती में सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

प्रसंस्करण कार्यों में इस्तेमाल होने वाले बांस की फसल को तैयार होने में 3 से 4 साल का समय लगता ही है। आमतौर पर इस किस्म के बांस की कटाई चौथे साल में शुरू की जा सकती है। ध्यान रखें कि बांस की नर्सरी के लिए सिंचाई व्यवस्था जरूर कर लें। सिंचाई व्यवस्था के लिए खेत के नजदीक में तालाब और ओवरहैड टैंक का निर्माण भी करवा सकते हैं। वहीं, बांस के खेत में खाद और पोषण प्रबंधन के लिए किसानों को अलग से खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती। बल्कि बांस से झड़ने वाली पत्तियां ही अपने आप पोषणयुक्त खाद का रूप ले लेती हैं। अच्छी उपज के लिए समय पर सिंचाई और पौधे के चारों तरफ मिट्टी चढ़ाने का कार्य करते रहें। इससे बांस की स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त होगा। 


बांस से बने उत्पाद

बांस की खेती (bans ki kheti)

हर इंसान ने अपनी जीवनशैली में लकड़ी के स्थान पर बांस से बने उत्पादों का प्रयोग शुरू किया है। इससे पर्यावरण में संतुलन भी बना रहेगा और मानव स्वास्थ्य़ को भी बेहतरी मिलेगी। इंसानों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी बांस संतुलित आहार के रूप में काम करता है। पशुओं के पोषण के लिए 3-4 महिने बाद ही हरे बांस की कटाई का कार्य कर लें। लेकिन प्रसंस्करण के लिए इसकी कटाई का कार्य रोपाई के 3 से 4 साल बाद फसल के परिपक्व होने पर ही करें। परिपक्व बांस का प्रसंस्करण करके बल्ली, सीढ़ी, टोकरी,चटाई टोकरी, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र आदि का निर्माण किया जा सकता है। आज बाजार में उपलब्ध सजावटी उत्पादों से लेकर, रसोई के सामान और कागज तक बांस से निर्मित होते हैं। कुछ राज्यों में घर की सजावट-बनावट से लेकर अचार बनाने तक में बांस का प्रयोग किया जा रहा है।


बांस की बिजनेस पर एक्सपर्ट की राय

बांस की बिजनेस पर एक्सपर्ट की राय

ये तो थी बांस की खेती (bans ki kheti) की बात। लेकिन, The Rural India पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, सरकारी योजना और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।


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