पिछले कुछ वर्षों में एलोवेरा (aloe vera) की मांग तेजी से बढ़ी है। अब बड़े पैमाने पर ऐलोवेरा की खेती (alovera ki kheti) भी हो रही है।

Aloe vera farming : एलोवेरा की खेती

एलोवेरा की खेती (alovera ki kheti): पिछले कुछ वर्षों में एलोवेरा (aloe vera) की मांग तेजी से बढ़ी है। कई कंपनियां इसके प्रोडक्ट बना रही हैं। अब बड़े पैमाने पर लोवेरा की खेती (alovera ki kheti) भी हो रही है। लेकिन किसानों के सामने यहीं प्रश्न होता है कि लोवेरा की खेती कैसे करें (aloe vera ki kheti kaise kare)? इसके लिए मार्केट कहां है? 

तो आज इस लेख में एलोवेरा की खेती (alovera ki kheti) के बारे में आसान भाषा में समझते हैं।

इस लेख में आप जानेंगे

  • एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) पर एक नजर 

  • ग्वारपाठा (एलोवेरा) के लिए ज़रूरी जलवायु

  • खेती के लिए उपयोगी मिट्टी

  • खेती का सही समय

  • एलोवेरा खेती की तैयारी कैसे करें

  • ऐलोवेरा की उन्नत किस्में

  • सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

  • रोग एवं कीट प्रबंधन कैसे करें।

  • मार्केटिंग एवं लागत व कमाई


एलोवेरा की खेती (alovera ki kheti) पर एक नजर 

एलोवेरा एक नगदी फसल है। इसकी खेती भारत में लगभग सभी राज्यों में की जाती है। पतंजलि, डाबर, बैद्यनाथ, रिलायंस कई बड़ी कंपनियां किसानों से सीधे ऐलोवेरा की फसल खरीद लेती हैं। लेकिन पल्प निकालकर बेचने पर किसानों को 4 से 5 गुना ज्यादा मुनाफा होता है।


Aloe vera farming : एलोवेरा की खेती


ग्वारपाठा (एलोवेरा) के लिए ज़रूरी जलवायु

ग्वारपाठे (aloe vera) को मुख्यतः गर्म आर्द्र से शुष्क और गर्ग जलवायु की आवश्यकता होती है। खेती शुष्क क्षेत्रों से लेकर सिंचित मैदानी क्षेत्रों में की जा सकती है। इसके लिए औसत तापमान 20-22 डिग्री सेंटीग्रेड की आवश्यकता होती है।


एलोवेरा की खेती (alovera ki kheti) के लिए उपयोगी मिट्टी 

ऐलोवेरा की खेती किसी भी प्रकार की उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है। परन्तु रेतीली मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी होती है। इसके अलावा अच्छी काली मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। जलभराव वाले मिट्टी में इसकी खेती करने से किसानों को बचना चाहिए। इसकी मिट्टी का पीएच मान 8.5 से अधिक नहीं होना चाहिए।

एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) का सही समय 

वैसे तो ऐलोवेरा की खेती सर्दियों को छोड़कर पूरे साल की जा सकती है। परन्तु ऐलोवेरा के पौधे को जुलाई-अगस्त में लगाना ज़्यादा उचित होता है। इसकी पौधों की रोपाई के लिए फरवरी-मार्च का महीना भी उपयुक्त होता है। 


ऐसे करें एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) की तैयारी

एलोवेरा की खेती करने से पहले आपको सही जगह और मिट्टी का चुनाव करना होगा ताकि आपकी फसल अच्छी हो। 

  • सबसे पहले आप अपने खेत की 2-3 बार जुताई कर लें और अपनी भूमि को संकल्प कर लें। एलोवेरा की खेती के लिए एक संकल्प भूमि का होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये एक पौधा 3-5 साल तक लगातार आपको फसल देता रहेगा।

  • अगर आप अपनी भूमि को और उपजाऊ बनाना चाहते हैं तो आप उसमें यूरिया भी डाल सकते हैं। यूरिया एक तरह का फ़र्टिलाइज़र होता है। आपको 1 हेक्टेयर के खेत के लिए लगभग 100 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल करना होगा।

  • एक बार आपकी भूमि एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) के लिए उपजाऊ हो जाए तब आपको ऊंची केरिया बनाकर उसमें एलोवेरा के बेबी प्लांट 2 मीटर की दूरी पर लगाने होंगे। हर केरी में भी 2 मीटर की दूरी होनी चाहिए।

  • एलोवेरा की पहली फसल 9-11 महीने में तैयार हो जाती है। आप इस फसल के ऊपर के पत्ते काट सकते है। आपको यह फसल जड़ से नहीं काटनी होती क्योंकि यही फिर से ऊगती है।

  • किसान सरकारी उद्यानिकी विभाग या अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि कॉलेज में संपर्क कर इस खेती के बारे में जानकारी ले सकते है। 

 

एलोवेरा की उन्नत किस्में

ऐलोवेरा की व्यवसायिक खेत के सदैव हाइब्रिड किस्मों का चुनाव करना चाहिए। क्योंकि हाइब्रिड किस्मों में पल्प की मात्रा ज्यादा होती है। भारत में अब ऐलोवेरा की कई उन्नत किस्में विकसित हो चुकी हैं। 

आई.सी1-11271,आई.सी.-111280, आई.सी.-111269 और आई.सी.- 111273 का व्यावसायिक तौर पर उत्पादन किया जा सकता है। इन किस्मों में पाई जाने वाली एलोडीन की मात्रा 20 से 23 प्रतिशत तक होती है।


सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

एलोवेरा की खेती में बहुत अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। फिर मिट्टी में सदैव नमी होनी चाहिए। ऐलोवेरा में आप 10-15 दिनों में सिंचाई कर सकते हैं। 

घृतकुमारी (ऐलोवेरा) की अच्छी उपज के लिए खेत को तैयार करते समय 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए इससे उत्पादन में गुणात्मक रूप से वृद्धि होती है। गोबर की खाद का इस्तेमाल करने से पौधे की बढ़वार तेजी से होती है और किसान एक वर्ष में एक से अधिक कटाई कर सकता है। 

 

एलोवेरा में रोग एवं कीट प्रबंधन कैसे करें

पौधे को नुकसान से बचाने के लिए कीट नियंत्रण भी बहुत आवश्यक कदम है। एलोवेरा की फसल के लिए मैली बग एक बड़ा खतरा है और बड़ी बीमारी पत्तियों पर दाघ पड़ना है। तो एलोवेरा निराई योजना के लिए0. 1% पैराथियान या 0.2% मैलाथियान के जलीय घोल की उचित छिड़काव की जरूरत होती है


एलोवेरा की खेती के लिए मार्केटिंग और लागत व कमाई 

एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) में अपार संभावनाएं हैं। इसे बेचन के लिए बहतु ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। ऐसी कई कंपनियां है जो एलोवेरा की खेती के लिए किसानों से अनुबंध करती है। वे पौधे उपलब्ध करवाने के बाद खेत पहुंचकर उपज की खरीदी भी करती है। ये कंपनियां किसानों को एलोवेरा के लिए मार्केट उपलब्ध करवा रही है। 


किसान चाहे तो सीधे आयुर्वेद या अन्य हर्बल प्रोडक्ट बनाने वाली अन्य कंपनियों को भी चुन सकते है। इसे आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने वाली कंपनियां तथा प्रसाधन सामग्री निर्माताओं को बेचा जा सकता है। 


ऐलोवेरा की खेती में लागत की बात करें तो लागत 50,000 प्रतिहेक्टेयर से शुरू होती है और क्षेत्रफल के हिसाब से बढ़ती जाती है। इसकी मोटी पत्तियों की देश की विभिन्न मंडियों में कीमत लगभग 15,000 से 25,000 रुपए प्रति टन होती है जिससे किसान मोटी कमाई कर सकता है


ये तो थी एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) की बात। लेकिन, The Rural India पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, सरकारी योजना और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।


अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो, तो इसे मित्रों तक जरूर पहुंचाए। जिससे दूसरे किसान मित्र भी एलोवेरा की खेती (aloe vera farming) की जानकारी प्राप्त कर सकें।


यह भी देखें-


ये भी पढ़ें-

Axact

Contribute to The Rural India (Click Now)

हम बड़े मीडिया हाउस की तरह वित्त पोषित नहीं है। ऐसे में हमें आर्थिक सहायता की ज़रूरत है। आप हमारी रिपोर्टिंग और लेखन के लिए यहां क्लिक कर सहयोग करें।🙏

Post A Comment:

0 comments: