बारिश के मौसम में पशुओं को होने वाले गलघोंटू रोग के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार | hemorrhagic septicemia in hindi, galghotu rog ki jankari
बारिश के मौसम में पशुओं को होने वाले गलघोंटू रोग के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार | hemorrhagic septicemia in hindi

hemorrhagic septicemia in hindi: बारिश के दौरान पशुपालक दोहरी चुनौतियों से जूझते हुए दिखाई देते हैं। इसमें एक समस्या पशुपालकों को होती है पशु की उत्पादकता को लेकर और दूसरी होती है पशु से जुड़ी बीमारियों को लेकर। 


बरसात के दिनों में पशुओं को रोग होने की संभावना अन्य मौसम से ज्यादा होती है। मानसून में पशुओं को गलघोंटू रोग (hemorrhagic septicemia) की समस्या सबसे अधिक होती है। 


तो आइए, द रूरल इंडिया के इस ब्लॉग में मानसून में होने वाले गलघोंटू रोग के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार (galghotu rog ki jankari) को विस्तार से जानें। 


गलघोंटू रोग (hemorrhagic septicemia)

यह एक संक्रामक रोग है जिसके होने पर 24 घंटे के अंदर-अंदर पशु की मौत भी हो जाती है। गलघोंटू रोग मानसून के दौरान बहुत तेजी से अपने पैर पसारता है। यह रोग पशु को पास्चुरेला मल्टोसिडा नामक जीवाणु की चपेट में आने की वजह से होता है। इस रोग के दौरान पशु के सांस की ऊपर वाली नली बुरी तरह प्रभावित होती है। 


गलघोंटू रोग के लक्षण (galghotu rog ke lakshan)

इस रोग के होने पर पशु के ऊपर इसके कई लक्षण दिखाई दे देते हैं। 

जैसे-

  • गलघोंटू रोग में पशु को तेज बुखार होने लगता है। 

  • इस रोग के दौरान पशु की आंखे लाल रहने लगती है। 

  • इस रोग के होने पर पशु को सांस लेने में खासी दिक्कत होती है। 

  • यही नहीं गलघोंटू के दौरान पशु की नाक बहने लगती है और उसकी छाती में बेहद दर्द हो जाता है। 


गलघोंटू रोग से पशु को बचाने का तरीका (galghotu rog ka ilaj)

  • मानसून के मौसम से पहले पशु को गलघोटू रोग का टीकाकरण करवाना चाहिए। 

  • पशु के रहने के स्थान की साफ सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए। 

  • पशु को खुले में चरने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए।


गलघोटू रोग का उपचार (galghotu rog ka upchar)

गलघोटू एक बेहद संक्रामक रोग है, ऐसे में इस रोग के उपाय करने में जरा भी वक्त गवाना भारी पड़ सकता है। इसलिए कोशिश करें कि रोग के लक्षणों की पहचान होते ही किसी चिकित्सक से सहायता लें। पशु चिकित्सक इस दौरान पशु को एंटीबायोटिक दवा दे सकता है। लेकिन इस रोग से ठीक होने की संभावना तब भी बेहद कम है। 


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